बदायूं संवाददाता।
विद्या भारती से संबद्ध शिव देवी सरस्वती शिशु मंदिर, सिविल लाइंस बदायूं में महर्षि वाल्मीकि जयंती पूर्ण हर्षोल्लास एवं श्रद्धाभाव के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में विद्यालय के भैया-बहिनों ने गीत, कविताओं और प्रेरक विचारों के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि के जीवन एवं आदर्शों को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का मुख्य संदेश रहा कि दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम और आत्मविश्वास से व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। कार्यक्रमाध्यक्ष सुबोध मिश्रा, मुख्य वक्ता नरेश पाल सिंह और विद्यालय के प्रधानाचार्य सुशील कुमार ने महर्षि वाल्मीकि के चित्र पर पुष्पार्चन कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद विद्यार्थियों ने मनमोहक गीत, कविताएं और महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किए।
कक्षा प्रथम की रुद्राणी ने अपनी प्रस्तुति से मोहा मन
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण कक्षा प्रथम की बहिन रुद्राणी की प्रस्तुति रही। रुद्राणी ने ढोलक की थाप के साथ अपनी मधुर आवाज में गीत प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उसकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर प्रधानाचार्य सुशील कुमार ने उसे पुरस्कृत किया।
प्रधानाचार्य सुशील कुमार ने कहा कि विद्यालय विद्यार्थियों की अंतर्निहित प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें निखारने का कार्य करता है। रुद्राणी की प्रस्तुति ने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई विशेष गुण छिपा होता है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने, प्रोत्साहित करने और उचित अवसर प्रदान करने की है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे संकोच छोड़कर अपनी प्रतिभाओं को सामने लाएं।
आत्मचिंतन और साधना से बदला रत्नाकर का जीवन
मुख्य वक्ता नरेश पाल सिंह ने महर्षि वाल्मीकि के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार रत्नाकर नामक डाकू ने आत्मचिंतन और साधना के माध्यम से अपने जीवन में परिवर्तन किया और आगे चलकर महर्षि वाल्मीकि के रूप में विख्यात हुए।
उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि का जीवन प्रेरणा देता है कि मनुष्य दृढ़ संकल्प और सत्कर्मों के माध्यम से स्वयं में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अनेक संभावनाएं और प्रतिभाएं छिपी होती हैं, जिन्हें पहचानकर विकसित करना आवश्यक है।
विद्यालय के मीडिया प्रभारी आचार्य लालाराम वर्मा ने कहा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और सीखने के अवसर केवल विद्यालय तक सीमित नहीं हैं। बच्चे घर पर भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। इसके लिए समय के महत्व को समझना, उसका सदुपयोग करना और गुरुजनों के बताए मार्ग पर चलना आवश्यक है।
महापुरुषों के आदर्शों से प्रेरणा लें विद्यार्थी
कार्यक्रमाध्यक्ष सुबोध मिश्रा ने अपने आशीर्वचन में कहा कि महापुरुषों की जयंती मनाने का उद्देश्य उनके जीवन, विचारों और आदर्शों से प्रेरणा प्राप्त करना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विद्यार्थी महर्षि वाल्मीकि के जीवन से प्रेरणा लेकर श्रेष्ठ कार्य करेंगे तथा अपने परिवार, समाज और राष्ट्र का गौरव बढ़ाएंगे।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ आचार्य कौशल किशोर पाठक तथा शिशु भारती के पदाधिकारी भैया-बहिनों ने किया।
इस अवसर पर विद्यालय के आचार्य भोलेनाथ पाठक, रूपेंद्र सिंह, राकेश मिश्रा, नरेश पाल सिंह, अविलेश यादव, राहुल शर्मा, निरंजन सिंह, राजीव कुमार सिंह, अनुराग मिश्रा, कु. आयुषी, पूजा शर्मा, ज्योत्सना सिंह, कंचन गुप्ता, रिया राजपूत, अंचल पाठक, प्रियंका सिंह एवं सुमन शर्मा सहित विद्यालय का समस्त स्टाफ उपस्थित रहा।

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