नया बदायूं, प्रयागराज। राज्य ब्यूरो
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें ही संबंधित ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त किया गया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया इस व्यवस्था पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे संविधान और पंचायती राज व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत माना है। वही सरकार से जबाव मांगा है l
यह आदेश न्यायालय ने अरविंद राठौर द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ग्राम प्रधान का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसी व्यक्ति को प्रशासक नियुक्त करना संविधान के 73वें संशोधन और पंचायती राज अधिनियम की मंशा के अनुरूप नहीं है। याचिका में इस शासनादेश को निरस्त किए जाने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार के निर्णय पर सवाल उठाते हुए फिलहाल उसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी और राज्य सरकार से इस संबंध में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को निर्धारित की गई है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद प्रदेश की हजारों ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक संचालन को लेकर नई स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अदालत में क्या पक्ष रखती है और अगली सुनवाई में न्यायालय क्या अंतिम दिशा-निर्देश जारी करता है। इस फैसले का असर उन सभी ग्राम पंचायतों पर पड़ सकता है, जहां प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी गई थी। पंचायत प्रतिनिधियों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की नजर अब 13 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हुई है, क्योंकि इस मामले का निर्णय प्रदेश की पंचायत व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

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