नया बदायूं, संवाददाता।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक और सहसवान-रामपुर-ग्वालियर घराने के प्रमुख कलाकार उस्ताद इफ़्तिख़ार हुसैन ख़ान के निधन से संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई। बदायूं की धरती से निकलकर देश-विदेश में भारतीय शास्त्रीय संगीत की पहचान बनाने वाले उस्ताद इफ़्तिख़ार हुसैन ख़ान ने अपनी गायकी और संगीत साधना से अलग पहचान बनाई।
उस्ताद इफ़्तिख़ार हुसैन के पिता को मिल चुका है पद्म भूषण
ख़ान महान ‘तराना सम्राट’ पद्म भूषण उस्ताद निसार हुसैन ख़ान के पुत्र थे। उन्हें बचपन से ही अपने पिता से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा मिली। सहसवान-रामपुर-ग्वालियर घराने की समृद्ध सेनिया परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ख्याल, ठुमरी, दादरा और तराना गायन में विशेष दक्षता हासिल की। उन्होंने विभिन्न रागों पर आधारित अनेक बंदिशों की भी रचना की।
प्रस्तुतियां हुई प्रसारित
उनकी शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुतियां आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। अपनी विशिष्ट आवाज और गायन शैली के कारण वह श्रोताओं के बीच खास पहचान रखते थे। संगीत के प्रति उनका समर्पण जीवनभर बना रहा और उन्होंने नई पीढ़ी को भी इस परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया।
संगीत समिति की थी स्थापना
पिता उस्ताद निसार हुसैन ख़ान की स्मृति में उन्होंने ‘परंपरा-उस्ताद निसार हुसैन ख़ान संगीत समिति’ की स्थापना की थी। इसके माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा और प्रचार-प्रसार का कार्य किया जाता रहा। उनके अनेक शिष्य देश-विदेश में संगीत साधना कर इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
बदायूं में सुपुर्द-ए खाक हुए उस्ताद इफ्तिखार हुसैन खान
शनिवार की दोपहर उस्ताद इफ़्तिख़ार हुसैन ख़ान को बदायूं स्थित छोटे सरकार के पीछे कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। उनके अंतिम संस्कार में परिजन, परिचित, संगीत प्रेमी और बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। उनके निधन को भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
